पुछताछ करके घरसे निकला मैं प्रभु के धाम।
बड़ा सहज लगता था मुझको जपना प्रभु का नाम।
बीच रास्ते मिल गये मुझको बचपनके यार।
खेलकुदमें ऐसे उलझा, न साँझा प्रभु का नाम।
खेलकुदसे जब थका हार फिर निकला प्रभुके धाम
बीच रास्ते मोह लिया मोहे मोहनकी राधाने।
मोह माया में ऐसे जकड़ा गृहस्थीनें जैसे पकड़ा।
भुल गया मैं प्रभु का नाम, रास्ता प्रभु धाम का।
मदमोह से जब देर सवेर मैं जागा
द्वार खड़े देख यमदुतों का घेरा।
देर भयी फिर भी न समझा।
कठीन है मिलना धाम प्रभु का।
बड़ा सहज लगता था मुझको जपना नाम प्रभु का।
भटक गया कब मोहमायामें मैं ये समझ न पाया।
देर आये दुरुस्त आये, अब तो सुमिरन करले।
हे मन बावरे अब तो प्रभु का नाम स्मरले।
..... स्वामी खडकानंद
बड़ा सहज लगता था मुझको जपना प्रभु का नाम।
बीच रास्ते मिल गये मुझको बचपनके यार।
खेलकुदमें ऐसे उलझा, न साँझा प्रभु का नाम।
खेलकुदसे जब थका हार फिर निकला प्रभुके धाम
बीच रास्ते मोह लिया मोहे मोहनकी राधाने।
मोह माया में ऐसे जकड़ा गृहस्थीनें जैसे पकड़ा।
भुल गया मैं प्रभु का नाम, रास्ता प्रभु धाम का।
मदमोह से जब देर सवेर मैं जागा
द्वार खड़े देख यमदुतों का घेरा।
देर भयी फिर भी न समझा।
कठीन है मिलना धाम प्रभु का।
बड़ा सहज लगता था मुझको जपना नाम प्रभु का।
भटक गया कब मोहमायामें मैं ये समझ न पाया।
देर आये दुरुस्त आये, अब तो सुमिरन करले।
हे मन बावरे अब तो प्रभु का नाम स्मरले।
..... स्वामी खडकानंद
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