Tuesday, May 19, 2020

डर डर के क्यु जीना है।

डर डर के क्यु जीना है।
जीना है तो एक दिन सबको मरना है।

कोरोना से डरोना, रोज़ रोज़ क्यु रोना है।
मर मर के जीनेसे आजही मर जाना अच्छा है।

अब सब लोग आपको डरायेंगे।
हर कोई इम्युनिटी बढ़ानेको बोलेंगे।

कल तक जो बेचते थे मधुमेह की दवाईयॉं।
आज वोही बेचेंगे इम्युनिटीकी दवाईयॉं।

जीना यहाॅं अब तो मेहेंगा है।
मरना यहाॅं अब तो सस्ता है।

गाडी हो या हो घोडा हर चीजपर कोरोना है।
इंसान हो या वस्तु छुना इनको मना है।

जगपर छाया अब कोरोना है।
ये बस उसकी माया है।

रोज डर डरके जीने से
इक बार ही मरना अच्छा है।

अब तो सुमिरन करले...

पुछताछ करके घरसे निकला मैं प्रभु के धाम।
बड़ा सहज लगता था मुझको जपना प्रभु का नाम।

बीच रास्ते मिल गये मुझको बचपनके यार।
खेलकुदमें ऐसे उलझा, न साँझा प्रभु का नाम।

खेलकुदसे जब थका हार फिर निकला प्रभुके धाम
बीच रास्ते मोह लिया मोहे मोहनकी राधाने।

मोह माया में ऐसे जकड़ा गृहस्थीनें जैसे पकड़ा।
भुल गया मैं प्रभु का नाम, रास्ता प्रभु धाम का।

मदमोह से जब देर सवेर मैं जागा
द्वार खड़े देख यमदुतों का घेरा।

देर भयी फिर भी न समझा।
कठीन है मिलना धाम प्रभु का।

बड़ा सहज लगता था मुझको जपना नाम प्रभु का।
भटक गया कब मोहमायामें मैं ये समझ न पाया।

देर आये दुरुस्त आये, अब तो सुमिरन करले।
हे मन बावरे अब तो प्रभु का नाम स्मरले।

..... स्वामी खडकानंद

बहती धारा

ये ज़िंदगी है जैसे बहती धारा।
न है इसका कोई किनारा।

 ज़िंदगी यहाँ  ज़रा थमसी गयी है।
साॅंसे यहाँ ज़रा रुकसी गयी है।

ठैहरे है आज लम्हें कुछ ऐसे।
ठैहरे है आज हवॉं के झोंके जैसे।

ठहर नहीं सकती ये आस अपनी।
जब तक है ये साँस अपनी।

थमसी गयी है ये जीवन की धारा।
थमती नहीं है ये विचारों की धारा।

जीवन तो है एक बहती धारा।
न कभी रुकेगी न कभी थमेंगी।

दूर करी हे संकट अनंता...

घरा बैसोनिया सारे जन
वेळ हा कैसा जाता जाईना

कोणी पाही रामायण-महाभारत
कोणी लावी हा चित्रपट

कोणासी केवळ मनी मानसी चिंतन
तरी हा वेळ हा जाईना निरंतर

कोरोनाचा हा खेळ चाले जगभर
थांबले हे जग क्षणभर

सुनील म्हणे हे पाहवे ना डोळा
आता तरा तुज येवो दयाघना

नाडले हे जन जन सारे
तुजवीण अनंता कोण धावे

धाव धाव आता रे भगवंता
दूर करी हे संकट अनंता